भारत ने ग्रेचुइटी पात्रता की अवधि 5 साल से घटाकर 1 साल कर दी, 21 नवंबर 2025 से लागू

भारत ने ग्रेचुइटी पात्रता की अवधि 5 साल से घटाकर 1 साल कर दी, 21 नवंबर 2025 से लागू

21 नवंबर 2025 की आध्यात्मिक रात 12 बजे, भारत के लाखों श्रमिकों की जिंदगी बदल गई। भारत सरकार ने ग्रेचुइटी पात्रता की अवधि 5 साल से घटाकर केवल 1 साल कर दी — एक ऐसा बदलाव जिसकी उम्मीद लाखों अस्थायी और फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों ने दशकों से रखी थी। यह बदलाव श्रम कोड के तहत लागू हुआ, जिसमें 29 पुराने श्रम कानूनों को चार नए कोडों में बदल दिया गया: वेतन कोड, 2019, औद्योगिक संबंध कोड, 2020, सामाजिक सुरक्षा कोड, 2020, और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य की शर्तें कोड, 2020

क्यों यह बदलाव इतना बड़ा है?

पहले, अगर कोई कर्मचारी 5 साल पूरे किए बिना नौकरी छोड़ देता था — चाहे वह रिटेल, होटल, आईटी या लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में हो — तो उसे ग्रेचुइटी मिलना असंभव था। यह तब तक चला जब तक न तो मृत्यु हो गई थी, न ही अक्षमता। लेकिन अब? एक साल की लगातार सेवा के बाद, चाहे कर्मचारी इस्तीफा दे, नियुक्ति समाप्त हो जाए, या बर्खास्त कर दी जाए, वह ग्रेचुइटी का हकदार है। यह बदलाव विशेष रूप से उन लोगों के लिए बड़ी खबर है जो हर 12-18 महीने में नौकरी बदलते हैं।

यहाँ एक छोटा सा आँकड़ा: भारतीय श्रम और रोजगार मंत्रालय के अनुसार, देश में लगभग 60% फॉर्मल सेक्टर के कर्मचारी 5 साल से कम समय तक एक ही कंपनी में रहते हैं। यानी, लगभग 8 करोड़ लोग अब तक ग्रेचुइटी के लिए अयोग्य थे। अब वे सभी अयोग्य नहीं रहे।

ग्रेचुइटी कैसे गणना होगी? नए नियम

अब ग्रेचुइटी की गणना में 'वेतन' की परिभाषा बड़ी हो गई है। पहले बेसिक पे और डियरनेस अलाउंस ही शामिल होते थे। अब रिटेनिंग अलाउंस भी शामिल है। और यहाँ एक बड़ा ट्विस्ट: कुल वेतन का 50% (या जितना घोषित किया जाए) वेतन में जोड़ा जाएगा। यानी, अगर कोई कर्मचारी ₹50,000 महीने कमा रहा है, तो उसकी ग्रेचुइटी की गणना ₹75,000 पर होगी। इसका मतलब अब ग्रेचुइटी खुद भी वेतन के हिस्से के रूप में गिनी जाएगी — जिससे भविष्य के पेंशन और सामाजिक सुरक्षा लाभ भी बढ़ सकते हैं।

इसके अलावा, फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को अब स्थायी कर्मचारियों के बराबर वेतन मिलेगा, अगर वे समान कार्य कर रहे हों। यह एक ऐसा नियम है जो लंबे समय से चल रही असमानता को समाप्त करता है।

कंपनियों के लिए क्या बदलाव?

यह बदलाव कर्मचारियों के लिए बड़ा उपहार है, लेकिन कंपनियों के लिए एक नया बोझ। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार, इन बदलावों से नियोक्ताओं के श्रम लागत में 5-7% की वृद्धि हो सकती है। क्यों? क्योंकि अब ग्रेचुइटी की राशि बढ़ रही है — और वह भी अधिक संख्या में कर्मचारियों के लिए।

हालाँकि, प्रोविडेंट फंड (PF) की दरें अभी भी ₹15,000 मासिक वेतन की सीमा तक ही रहीं हैं। यानी, अगर कोई ₹20,000 कमा रहा है, तो PF केवल ₹15,000 पर ही लगेगा। लेकिन ग्रेचुइटी अब असली वेतन पर लगेगी। इसका मतलब कुछ कंपनियाँ अपने CTC (कॉस्ट टू कंपनी) को फिर से डिज़ाइन कर सकती हैं — शायद बेसिक पे कम करके, और बोनस या अन्य भत्तों को बढ़ाकर। इससे कुछ कर्मचारियों का टेक-होम पे कम हो सकता है।

डिजिटल सिस्टम और समय सीमा

डिजिटल सिस्टम और समय सीमा

अब कर्मचारी ऑनलाइन ग्रेचुइटी क्लेम दाखिल कर सकते हैं। भारतीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने घोषणा की है कि कंपनियों को क्लेम का निपटान 30 दिनों के भीतर करना होगा। पहले यह 3-6 महीने लग जाते थे। अब डिजिटल प्रणाली ने इसे लगभग तुरंत बना दिया है।

इस नए सिस्टम का लाभ विशेष रूप से उन लोगों को मिलेगा जो शहर से शहर जाते हैं — जिनके पास कभी कागजात नहीं रहते थे। अब वे अपने फोन से क्लेम दाखिल कर सकते हैं।

क्या यह सब अभी से लागू है?

हाँ। 21 नवंबर 2025 से यह सब लागू हो गया है। लेकिन कंपनियों को पूरी तरह से अपने HR और पेमेंट सिस्टम को अपडेट करने का समय दिया गया है। भारतीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने 31 दिसंबर 2025 तक की समय सीमा निर्धारित की है। इसके बाद अगर कोई कंपनी नियम नहीं मानती, तो उस पर जुर्माना लगेगा।

क्यों यह बदलाव इतना लंबा लगा?

क्यों यह बदलाव इतना लंबा लगा?

यह बदलाव 2019 में शुरू हुआ था। तब चार श्रम कोड पेश किए गए। लेकिन लागू करने में 6 साल लग गए। क्यों? क्योंकि भारत में श्रम कानून इतने टुकड़े-टुकड़े थे कि एक छोटी कंपनी के पास 29 अलग-अलग नियमों को समझना और मानना असंभव था। अब चार कोडों में सब कुछ समाहित है। यह एक ऐसा सुधार है जिसकी उम्मीद दशकों से थी — और अब वह सच हो गई है।

क्या यह बदलाव केवल शहरी कर्मचारियों के लिए है?

नहीं। यह सभी फॉर्मल सेक्टर के कर्मचारियों के लिए है — चाहे वे बंगलौर में हों, या राजस्थान के एक छोटे शहर में एक रिटेल स्टोर में। यह एक राष्ट्रीय बदलाव है। यह उन लोगों के लिए है जो अपने बच्चों के लिए बचत नहीं कर पाते थे। अब वे कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्रेचुइटी की गणना अब कैसे होगी?

अब ग्रेचुइटी की गणना बेसिक पे, डियरनेस अलाउंस, रिटेनिंग अलाउंस और कुल वेतन के 50% (या निर्धारित अनुपात) के आधार पर होगी। यानी अगर कोई कर्मचारी ₹40,000 महीने कमा रहा है, तो उसकी ग्रेचुइटी ₹60,000 पर आधारित होगी। इससे ग्रेचुइटी की राशि लगभग 50% तक बढ़ सकती है।

क्या फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को भी स्थायी कर्मचारियों जितना वेतन मिलेगा?

हाँ। अब कोई भी फिक्स्ड-टर्म कर्मचारी जो स्थायी कर्मचारी के समान कार्य कर रहा है, उसे समान वेतन मिलेगा। यह भेदभाव को समाप्त करने का एक बड़ा कदम है। इससे अस्थायी नौकरियों में असमानता कम होगी।

क्या यह बदलाव ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू होगा?

हाँ। यह बदलाव फॉर्मल सेक्टर के सभी कर्मचारियों के लिए लागू है, चाहे वे दिल्ली के ऑफिस में हों या बिहार के एक छोटे शहर में एक फैक्ट्री में। यह एक राष्ट्रीय नीति है और ग्रामीण क्षेत्रों में भी डिजिटल क्लेम सिस्टम के माध्यम से लागू होगा।

क्या ग्रेचुइटी अब पेंशन के साथ जुड़ जाएगी?

हाँ। अब ग्रेचुइटी की राशि वेतन के हिस्से के रूप में गिनी जाएगी, जिससे पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ भी बढ़ सकते हैं। यह एक ऐसा अंतर्निहित प्रभाव है जिसकी अभी तक कम चर्चा हुई है।

क्या नौकरी बदलने वाले लोगों को अब ग्रेचुइटी मिलेगी?

हाँ। अब जो लोग हर 12-18 महीने में नौकरी बदलते हैं — वे भी ग्रेचुइटी पाएंगे। यह रिटेल, होटल, आईटी और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले लाखों लोगों के लिए एक बड़ी राहत है।

क्या कंपनियों को अब ग्रेचुइटी का भुगतान तुरंत करना होगा?

हाँ। अब कंपनियों को कर्मचारी के निकास के 30 दिनों के भीतर ग्रेचुइटी देनी अनिवार्य है। अगर देरी होती है, तो ब्याज लगेगा और जुर्माना भी। डिजिटल प्रणाली ने इसे बहुत तेज बना दिया है।